मिल रहे हैं हम सालों बाद। आज बचपन जो बिताए हमने साथ-साथ, स्कूल के दिन थे वो मतवाले पढ़ाई के साथ मस्ती करने के थे। हम जो दीवाने कन्या शाला के थे, हम कन्याओं की चर्चे आज भी चर्चाओं का विषय है।
अगर स्कूल का इतिहास खोले, तो हमारे ही किस्से नजर आएंगे, क्योंकि हमने स्कूल लाइफ को बड़ी सिद्दत और मोहब्बत के साथ जिया है। हर गुरूजनों का आदर, तो सब सहेलियों को आदाब किया है।
रोज स्कूल आना, पढ़ाई में पूरा मन लगाना, शिक्षक दिवस से लेकर 26 जनवरी तक हर उत्सव में उत्साह से भाग लेना यह सब स्कूल की वह लंबी यात्रा है, जिसे हमने छोटी सी उम्र में जिया है। आज सोचते हैं तो लगता है कि हमसे वो सुनहरा दौर दूर हो गया है। काश, क्लासरूम के ब्लैक बोर्ड की भाँति हमारी जिंदगी के पल भी होते, जिन पर जब चाहे वही दिन लिख पाते।
जीवन का अर्थ तो अब समझ आता है। बचपन तो मस्ती शास्त्र में बीत जाता है। उस वक्त दुःख दर्द जैसे गणित के कठिन प्रश्न स्कूल के पल में नहीं होते थे। हिन्दी जैसे सरल पाठ ही थे। आज कन्या शाला की खट्टी-मीठी यादों के चौप्टर को फिर रिवाइन कर लें जब हमें हमारी सभी सहेलियों का साथ मिल रहा है, तो इस पल को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लें, क्योंकि आज दो इत्तेफाक है। पुरानी सहेलियों का मिलन, वो भी मित्रता दिवस पर इससे बड़ा दिन और उपहार भला क्या हो सकता है?

बचपन की शरारतें
“अपने अपने रस्तों पर सब, संग उम्र के निकल गए हैं।
अंदर से वैसे ही हैं बस, दिखने में कुछ बदल गए हैं।
अरसे बाद मिले हैं सारे, यार सुहाने मौसम के तो।
वहीं शरारत बचपन की, एक बार चलो फिर करते हैं।
यूं तो थी हर बात पे मस्ती, क्लासरूम में थोड़े चुप-चुप।
मीठे बेर कटोरी वाले, गेट वाली के चाट और गुपचुप ।
बातों में बदमाशी बुनते, एक-दूजे की कहते-सुनते।
कन्या शाला जाने वाली, सड़क घेर के चलते हैं।
वहीं शरारत बचपन की, एक बार चलो फिर करते हैं।
आगे किसको क्या करना है, इसका कोई जिक्र नहीं था।
अपनी धुन के मनमौजी थे, बाकी कोई फिक्र नहीं थी।
बड़ा सा आंगन, पेड़ और बाड़ी, और यारों की टोली थी।
टीवी, फोन नहीं थे तो क्या, ‘बिनाका’ वाली बोली थी।
अब भी याद हैं सारी बातें, चाहे कुछ धुंधली हों यादें।
इन यादों को आज चलो फिर, मिलकर ताजा करते हैं।
वहीं शरारत बचपन की, एक बार चलो फिर करते हैं।”
